Saturday, March 13, 2010

अरे कोई चमचा समानता बिल भी पेश करो भाई


सार्वजनिक तौर आप किसी का चमचा कहलाना पसंद करते है क्या ? शायद नहीं ना. पर वक्त पडने पर किसी ना किसी की चमचई जरूर करते होगे. मै तो करता हूं. क्या आप नहीं करते क्या? पर भाई इस चमचई का सार्वजनिक प्रदर्शन अच्छा है क्या?. पर भईया अब चमचई की भी सीमा तय की जानी चाहिए. एलओसी टाइप यानी लाइन ऑफ कंट्रोल टाइप. भईया ये वहीं लाइन ऑफ कंट्रोल है जिसके लिए हर देश अपने पड़ोसी मुल्क के साथ भिड़ा रहता है.
खैर एलओसी वेलोसी की बात छोडिए, ज्यादा कम्यूनिकेटिव होते हुए या सरल भाषा में कहूं तो चमचई की सीमा तय की जानी चाहिए, जरूरत पड़े तो इसे कानूनी मान्यता देने के लिए महिला आरक्षण बिल की तरह संसद में चमचा समानता बिल भी पेश किया जाना चाहिए, पर भई इसके लिए नेताओं को थोड़ा निरपेक्ष्य होना होगा, आखिर वे भी किसी ना किसी की चमचई कर ही यहां पहुंचे हैं. अब इन नेताओं के पीछे भी चमचों की लंबी फौज है, जिसमें रिपोर्टर, कैमरामेन से लेकर स्ट्रिंगर, इलाके से छुटभैया से बाहुबली, किरानी से आईएएस आईपीएस तक सभी शामिल होते है जो अपनी अपनी हैसियत और नजदीकियों के हिसाब से चमचागिरी में शामिल होते है. पर अब वक्त आ गया है जब सभी चमचों को बराबरी का हक मिले. जिस तरह लोकतंत्र में जाति,धर्म, भाषा, क्षेत्र को लेकर किसी तरह के भेद को ख़त्म कर सभी को समान अधिकार दिया गया है, उसी तरह सभी चमचों को भी बगैर किसी भेद के बराबरी का दर्जा दिया जाए. चाहे वो बड़ा से बड़ा पत्रकार हो या कैमरामैन,बाहुबली हो या छुटभैया. और नेता इन सभी को बराबरी के स्तर पर चमचा ही माने कोई चमचा नंबर वन या दो नहीं.
पत्रकारिता में खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कर रहे चमचों को शिकायत है कि चमचों की बूम पकड़ने वाली प्रजाति, कैमरा पकड़ने वाली प्रजाति पर ज्यादा हावी होने लगी है. पहली प्रजाति नेताओं को किनारे ले जाकर गुप चुप से सेटिंग गेटिंग कर लेती है और बेचारे कैमरा वाले चुपचाप सबकुछ देखते रहते है. चाहकर भी बेचारे कुछ कर नहीं पाते, मन मसोस कर रह जाते है कि उनके साथ के ही फलां ने चमचागिरी कर सफारी खरीद ली, फलां तो रोडछाप था पर अब सिंह साहब का आगे पीछे करते करते कितना आगे निकल गया और मैं वही सब करने के बावजूद हजार रूपये की नौकरी, वो भी कब चली जाए पता नहीं.
तो भईया सबका ख्याल करते हुए अब यही सही वक्त है जब सभी चमचों को बराबर का दर्जा दे दिया जाए ताकि किसी चमचे को अपने ही तरह के किसी चमचे से गिला शिकवा ना हो.
खैर, हम तो ठहरे पत्रकार. तो भैया कम से कम पत्रकारिता में चमचों के हित में आप भी अपनी आवाज बुलंद करे,जिससे इस प्रोफेशन में किसी को शिका यत ना हो और समानता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए कहें नो डिफरेंस बिटविन चमचा एंड चमचा का नारा बुलंद करें. क्यूंकि ना बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा है चमचैया ...

Thursday, September 24, 2009

ये दूरदर्शन भी बड़ा टोइंग है….

जर्नलिज्म की पढाई के दौरान पहले ही दिन से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्लास में लेक्चरर “भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और दूरदर्शन के इतिहास” के नोट्स देते नहीं थकते थे. और प्रायः यही जानकारी वे तब से देते आ रहे थे, जब से जर्नलिज्म की पढाई यूनिवर्सिटी में शुरू हुई थी. दूरदर्शन फलाने तारीख को शुरू हुआ....ग्रामीण विकास, शिक्षा और कृषि... वगैरह- वगैरह और न जाने क्या-क्या दूरदर्शन के खोले जाने के उद्देश्य थे. फिर बड़ी पीड़ा से कहते कि दूरदर्शन अपने उद्देश्य से भटक गया है.
पर मेरे लिए दूरदर्शन का यह इतिहास सिवाय बकथोथी के कुछ और नहीं लगता. 50 सालों के दूरदर्शन को मेरी उम्र के तक़रीबन 25 सालों ने नजदीक से देखा है. और मैंने अपने हिसाब से दूरदर्शन और टीवी की जो हिस्ट्री लिखी है, हो सकता है कि आप को बकथोथी लगे, पर पढ़िये जरुर.
हम लोगों की यादें धुंधली पर चुकी हैं. पर इतना याद है, शाम होते ही मोहल्ले के एकलौते घर में जहाँ टीवी था, भीड़ लग जाती. ब्लैक एंड व्हाइट 14 इंच की टीवी के सामने ज़मीन पर बैठ कर लोग “हमलोग” देखते. सालों बाद जब इसका रिपीट टेलीकास्ट देखा, तब पाया कि नन्हे, लल्लू और बसेसर राम की कहानी देखने वालो में कई पात्र तो तब टीवी के सामने और आसपास ही थे. रामायण-महाभारत के दौरान घर में टीवी नहीं था. प्रोग्राम शुरू होने के पहले ही पहुंच जाते चौधरी चाचा के घर. पहले खिड़की पर लटकते और देर तक चिरौरी करने के बाद जा कर कहीं टीवी के सामने जगह मिलती. तब टीवी के सामने बैठना ही मानो हम बच्चों के लिए महाभारत जीत लेने जैसा था.
नज़ारा तब भी वही होता.... एक टीवी और सामने मोहल्ले की भीड़. रामायण-महाभारत ने अरुण गोविल, दीपिका और नीतीश भारद्वाज जैसे कलाकारों को आम जनमानस की नज़रों में भगवान बना दिया. ये वही वक़्त था, जब मोगली के टाईटल सॉंग “जंगल-जंगल फूल खिला है..पता चला है.....” इतना पसंद आया कि अब ये मोबइल के रिंगटोंस में शामिल है.
दिन बीतते गए टीवी हमारे यहाँ भी आया, खास दिन चुनकर कि “जय संतोषी माँ” फिल्म दिखाई जायेगी. दिनभर हम भाई बहन स्कूल नहीं गए. एक-एक चीज देखते, एंटीना कैसे लग रहा है, तार ठीक है कि नहीं... फलाना के यहाँ तो ऐसा नहीं है....वैसा नहीं है...टीवी झिलमिलाता तब भी सामने बैठे रहे.
देर शाम आस पड़ोस को टीवी देखने का न्योता भी दे आया. तब पहली बार घर में अंग्रेजी और हिंदी के समाचार देखने में भी खूब मज़ा आया. समझ में आये या न आये. पडोसी भी संतोषी माँ की फिल्म देखने आने लगे. पर अचानक बत्ती गुल हो गई. लोग इंतजार करते रहे, बिजली नहीं आई, तो उंघते अनमनाते बेमन से घर गए. उस दिन से हर सुबह की शुरुआत टीवी के झिलमिलाने और फिर बन्दे मातरम से होती थी. कभी राष्ट्रीय शोक होता तो अफ़सोस, सप्ताह में दिखाई जाने वाली तीन फिल्मो का होता. गोलमाल, डिस्कोडांसर जैसी फिल्मे जब मंगलवार दोपहर प्रसारित हुई तब याद है, स्कूल में जहां करीब 1000 स्टूडेंट्स थे लंच के बाद 50-100 ही बचे थे. पर धीरे-धीरे टीवी का साइज़ बढा और सामने बैठने वालों की संख्या कम होती गयी.
चित्रहार जैसे प्रोग्रामों से दूरदर्शन रंगीन हो गया था. याद है और दिनों की अपेक्षा बुधवार को मेरे कई हमउम्र पढाई छोड़ नए-नए गाने देखने के लिए शाम खाने का टाइम 7:30 कर चुके थे. तब ऑप्शन नहीं थे. लोग ऐड भी देखते. इसी बीच कभी “प्यार हुआ इकरार हुआ....” वाला ऐड आता तो प्रायः हर घरों में टीवी के सामने बैठे परिवार वाले एक दूसरे से झेप जाते
चित्रहार जैसे प्रोग्रामों से दूरदर्शन रंगीन हो गया था. याद है और दिनों की अपेक्षा बुधवार को मेरे कई हमउम्र पढाई छोड़ नए-नए गाने देखने के लिए शाम खाने का टाइम 7:30 कर चुके थे. तब ऑप्शन नहीं थे. लोग ऐड भी देखते. इसी बीच कभी “प्यार हुआ इकरार हुआ....” वाला ऐड आता तो प्रायः हर घरों में टीवी के सामने बैठे परिवार वाले एक दूसरे से झेप जाते. घरों में बैठे बाबूजी बेटियों से पानी मांगने लगते तो बेचारे बेटे नए लगे बीएसएनएल फोन का बिल जमा नहीं करने की वज़ह से झाड़ खाते.
पर काफी तेजी से टीवी की दुनिया में सब कुछ बदल गया है. एमटीवी और वीटीवी के ज़माने में तेज़ रैंप और ढेंन टे ढेंन.... म्यूजिक के बीच आई-पिल, अनवांटेड-72, मैनफोर्स और ये तो बड़ा टोइंग है.... जैसे विज्ञापन इजिली एक्सेप्टेबल हो गए हैं. “हमलोग” के नन्हे, लल्लू, बसेसर अब भी आस पडोस में नज़र आते हैं. पर आज के टीवी की आदर्श बहू अचानक किसी रियलिटी शो में बिकनी पहन कर अपनी छवि बदलने में लगी है. बैडरूम का सच, “सच का सामना” बन कर सब लोगों तक पहुँच रहा है. सीता के बाद “राखी का स्वयम्वर” टीवी पर पूरी टीआरपी बटोर जाता है. दफ्तर का टेंशन कई बार फैशन टीवी दूर कर देता है... अब तो सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने भी टीवी की रात रंगीन बनाने का मन बना लिया है. कहें तो टीवी का इतना ग्लैमरस हो जाना अच्छा लगता है.... पर पूरे परिवार के सामने नहीं. सिर्फ अपने बैडरूम में....पर इन सब के बीच अब दूरदर्शन, दूर का दर्शन हो चूका है. जिसे शायद कम ही लोग देखना पसंद करते हैं.
ऐसे में दूरदर्शन के पचास सालों को डिफाइन करें तो कहा जा सकता है कि ये सफ़र मोहल्ले भर की भीड़ के सामने 14 इंच की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से लेकर आज के एलसीडी और एचडी टीवी के बैडरूम टीवी बनने की इतनी की कहानी है.
अगर आपको ये कहानी बकथोथी लगी तो बताइयेगा जरुर.

Thursday, June 18, 2009

वामपंथ सफर नक्सलवाडी से सिंगुर और लालगढ़ तक...

१५ वे लोकसभा चुनाव के पहले वामपंथियों को यह एहसास था की वे देश की तीसरी सबसे बड़ी ताकत हैं । लेकिन उनका यह भ्रम लगता है जनता के दिए फैसले के बाद भी नहीं टुटा । चार दशकों से उनके लिए अभेद्य किला रहे बंगाल में जबरदस्त सेंधमारी हो गई , वैचारिक बदलाव ने वामपंथ को जड़ से हिला दिया है । कभी वैचारिक तौर पर उनके साथ रहे माओवादी अब सीपीएम् के लोगो को ही बन्दूक की गोली के सामने रख सत्ता पा लेना चाहते हैं। उदाहरण सामने है - लालगढ़ में नक्सलियों ने ना सिर्फ़ कब्ज़ा कर वर्षो से चली आ रही सीपीएम् सरकार को चुनौती दी बल्कि आज वहां सीपीएम् के नेता -कार्यकर्ता उनके निशाने पर हैं । जाहिर तौर पर इसके लिए बंगाल की सीपीएम् सरकार ही दोषी है , कभी सामंत वाद के विरोध और किसानो के आन्दोलन का समर्थन , और भूमिहीनों को जमीन दिलाकर सीपीएम् ने अपनी ज़मीनमज़बूत की तो बाद में सिंगुर और नंदीग्राम में उन्ही किसानो को जमीन से बेदखल किया जाने की कोशिश सीपीएम् के जमींदोज़होने की वज़ह बन गए। तक़रीबन चार दशकों के राज ने सीपीएम् कार्यकर्ताओं और नेताओ को ही सामंती बना दिया जिस सामंतवाद के बिरोध ने उन्हें नई जान दी थी, उसी राह पर सीपीएम् भी चल पड़ी ।
नक्सल आन्दोलन की शुरुआत नक्सलवाडी से सामंतवादी और जमींदारो की नीतियों से शिकार रहे लोगो ने की , हिंसात्मक आन्दोलन के तौर पर शुरू हुए इस आन्दोलन की मांगो को एक तरह से बंगाल की सीपीएम् सरकार ने ही पुरा किया । सामंती व्यवस्था का अंत हुआ बंगाल में भूमि कानून बना कर भूमिहीनों को जमीन दी गई , वर्षों से जमींदारों की खेतों पर खेती करते आ रहे किसानो को जमीन का मालिकाना हक मिला। किसानो-मजदूरों का साथ मिला ,तब सीपीएम् के किसान समर्थित फैसलों ने बंगाल में उसकी जड़ को इतना मजबूत कर दिया की कोई दूसरी पोलिटिकल शक्ति सीपीएम् के सामने पनप नही पाई। कहीं ना कहीं इस दौरान नक्सलियों का समर्थन भी सीपीएम् के ही साथ रहा ।
पर कहते है की सत्ता भ्रष्ट बनती है तो वामपंथी इससे भला कैसे बचे रहते ? वर्षों से किसानो- मजदूरों हक की बात करने वाली सरकार ने उन्ही किसानो से जमीन छिनने की रणनीति बनाई। पूंजीवाद के विरोध के नारे के उलट किसानो की शर्त पर बुद्धदेव जैसे बुजुर्ग वामपंथी पूंजीवाद के समर्थन में आ खड़े हुए , किसानो से खेती योग्य जमीन छीन कर सिंगुर में टाटा के सपने सजाने की योजना बनने लगी , नंदीग्राम में आम किसान सीपीएम् के निशानेपर रहे सीपीएम् के कार्यकर्ता घरों में घुस कर महिलाओं से बलात्कार करने लगे, किसानो की हत्याएं की जाने लगी , वो सब कुछ हुआ जो अख्खड़ जमींदारो सामंतियों ने भी नही किया होगा। पर बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार मौन रही । सीपीएम् की ताकत रहे किसान मजदूर उससे दूर हो चुके थे। इसी का परिणाम था की जनता ने इस बार लोकसभा चुनावो में वामपंथियों को ना सिर्फ़ नकार दिया बल्कि यह भी संकेत से डाले की बंगाल का यह किला 20११ के विधानसभा चुनावो में जमींदोज ना हो जाए।

अब जब लालगढ़ में सीपीएम् के लोग ही निशाने पर हैं तो इतना तो कहा ही जा सकता है की नक्सलवाडी से सिंगुर और अब लालगढ़ के वामपंथी सफर में वामपंथ मृतप्राय हो चुका है , और इस दौरान किसानो -मजदूरों के मुद्दों पर राजनीती करने वाला वामपंथ अतिपूंजीवादी नीतियों को अपना चूका है ।

Wednesday, May 20, 2009

देखो...की जनता जाग गई ..लोकतंत्र का नया सबेरा

बिहार में लालू-पासवान की जोड़ी हासिये पर चली गई। चुनावो के पहले ख़ुद के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देखने वाले लालू प्रसाद का मुस्लिम-यादव समीकरण ध्वस्त हो गया तो दलित प्रधानमंत्री के तौर पर ख़ुद को प्रेजेंट करने वाले रामविलास पासवान अपने पारंपरिक सीट हाजीपुर से हार गए। कभी रिकॉर्ड मतों से वहां से जीतानेवाली जनता ने उन्हें इस बार नकार दिया, इस बार कम से कम बिहार ने यह साफ़ करदिया की वह सिर्फ़ जाति-धर्म के नाम पर अपने नुमाइंदे नही चुनेगी।बिहार में पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी दलित-मुस्लिम और लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल मुस्लिम-यादव समीकरणों की बदौलत जीतते रहे हैं । एक दुसरे के खिलाफ रहने वाले ये दोनों समाजवादी नेता जब एक मंच पर आए तो इनकी एकजुटता से बिहार में अच्छी सीटें आने की कम से कम इन्हे उम्मीद जरुर रही होगी, पर जनता ने यहाँ पिछले तीन-चार सालो में हुए विकास को तबज्जो दी,नीतिश कुमार के विकास कार्यों की बदौलत ही जनता ने यहाँ जद(यू) को वोट दिया और यहाँ एक तरह से एनडीऐ के हांथो दोनों समाजवादी नेता अपनी पुरानी जमीन गवां बैठे।


दूसरी तरफ़ देश भर में धार्मिक लामबंदी की बीजेपी की कोशिश कामयाब नही हो सकी। साल 1991 के बाद ये पहली बार है जब पार्टी को इतनी बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा ,वो भी तब जब पार्टी के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवानी ख़ुद पी ऍम बनने की होड़ में थे। बरुण गाँधी के बयानों से पार्टी को नुकसान हुआ ये बीजेपी के लोग भी स्वीकारते हैं , चुनावो में बीजेपी के सुपरस्टार प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी गुजरात में कोई खास कमाल करने में तो नाकाम रहे ही, दुसरे राज्यों में जहाँ कहीं भी उन्होंने प्रचार किया अधिकांश सीटो पर बीजेपी का कमल मुरझा गया। एक समय बीजेपी के गढ़ रहे राजस्थान, उतरांचल ,दिल्ली ,हरियाणा जैसे जगहों पर पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ । उडीसा के कंधमाल में जहाँ हिंदुत्व के नाम पर बजरंग दल और आर एस एस के कार्यकर्ता हिंसा फैलाते रहे , जहाँ बीजेपी ने धार्मिक दीवारें खींचने की तमाम कोशिशें कर रखी थी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा, बीजेपी के प्रत्याशी वहां तीसरे नम्बर पर खिसक गए,तो उडीसा में पार्टी का सुपडा ही साफ़ हो गया ।


चुनाव के ठीक पहले सिक्ख दंगो पर शुरू हुई राजनीति से भी बीजेपी शिरोमणि अकाली दल को उम्मीद थी पर यहाँ भी पंजाब सरकार की फेलियोर की वज़ह से सिक्खों ने कांग्रेस को ही वोट किया तो दिल्ली में भी जहाँ इन मुद्दों पर जगदीश टाईटलर - सज्जन कुमार के टिकट कटे वहां ना सिर्फ़ कांग्रेस जीती,बल्कि बीजेपी की दुर्गति हो गई ।


उतरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को भी उम्मीदों के मुताबिक जनसमर्थन नही मिली , भारतीय ओबामा बनने की मायावती की ख्वाहिश जनता के फैसले के बाद माया बन कर कम से कम पॉँच सालो के लिए टल गई। दलित के बेटी के प्रधानमंत्री बनने के सपनो को दलितों ने ही तोड़ दिया और कलावातिया के दर्द को संसद में उठाने वाले राहुल गाँधी पर उनका जमा विश्वास कमाल कर गया । दम तोड़ चुकी कांग्रेस को राहुल की विकासवादी छवि ने यहाँ नया आयाम दिया साथ ही विपक्षियों के जातिधर्म के नाम पर वोट पाने की उम्मीद और बीजेपी के धार्मिक कट्टरता का फायदा भी कांग्रेस को मिला। मुस्लिमो के भरोसे अपनी जमीन बचाने की सोच रही सपा को कट्टर हिंदुत्व का चेहरा बन चुके कल्याण सिंह को गले लगना भारी पड़ा। यूपी में सीटें लाकर बारगेनिंग पॉलिटिक्स करने की बीएसपी और सपा की मंशा को भी जनता ने नकार दिया।


उसी तरह साल भर से मराठा मानुष की बात कर क्षेत्रीयता के नाम पर महारास्त्र में हिंसा फैलाने वाले राज ठाकरे को मराठी जनता ने नकार दिया यही नही शिवसेना को भी धर्म -क्षेत्र की राजनीती की वज़ह से नुकसान उठाना पड़ा, मुंबई जैसे अपने किले में शिव सेना एक भी सीट नही जीत सकी। अलग तेलंगाना राज्य के डिमांड पर पहले यूपीए फिर चौथे मोर्चे और आख़िर में एनडीऐ के साथ आने वाले टीआरएस को भी मुह की खानी पड़ी। क्षेत्रीयता के नाम पर वोट जुगाड़ने और फिर बारगेनिंग कर सत्ता में आने वाली झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अपने गढ़ झारखण्ड में बुरी तरह हार कर दो सीटों तक सिमट गई तो एनडीए से लेकर यूपीए तक के शासन काल में हमेशा मंत्री बने रहने वाले कद्दावर रामबिलास ख़ुद तो हारे ही पार्टी एक भी सीट नही जीत सकी। वामपंथ विचारधारा के नाम पर उदारवादी और विकासपरक नीतियों के विरोध करने वाले वामपंथियों की ये सबसे बुरी हार है, इस बार बंगाल के अभेध्य किले में जबरदस्त सेंधमारी हो गई।


कुल मिला कर कहे तो इस बार के चुनावो में मेचयोरनेस देखा गया, जाति-धर्म के नाम पर बरगलाने वालो की हार हुई तो जनता ने उन सब को सबक सिखाया जिनके लिए राजनीति सेवा कार्य ना होकर सिर्फ़ राज करने की नीति बन कर रह गई थी।

Friday, May 8, 2009

लालूजी मीडिया से काहे का गुस्सा...


लालू जी कल वोट करने वेटेनरी कालेज पहुंचे तो उनके व्यव्हार में भी जानवरीपन सा नज़र आया। बौखलाहट , गुस्सा और कांग्रेस के ठेंगा दिखा दिए जाने की परेशानी के बीच हार जाने के खौफ से तमतमाए लालूजी मीडिया के फोटोग्राफरों / कैमेरामेनो को धक्का देने, भगाने लगे। मीडिया कर्मियों से बात तक नही की, आख़िर क्या बात है की मीडिया फ्रेंडली कहें जाने वाले लालू जी ने वोटिंग के दौरान ऐसा रूख दिखाया। फ़िर कहलवा दिया चुनाव के बाद मीडिया से बात करूँगा।
दरअसल बिहार के पत्रकारों ने १५ सालो तक वहां जंगल राज देखा है, रोजाना पटना के किसी ना किसी इलाके में किसी डॉक्टर, बिजनेसमेन, प्रोफेसर के अपहरण , मर्डर की खबरें आती थी। अपराध में बिहार कुख्यात हो चुका था। उस दौर में बिहार में पत्रकारिता करने वालो ने यहाँ जब नीतिश कुमार के सरकार को कुछ काम करता पाया तो उन्हें सुशासन बाबु का दर्जा दे दिया गया। नीतिश लोगो के साथ-साथ मीडिया की नज़रों में भी हीरो बनकर उभरे। पर बजाए इसके वे कभी कभार मीडिया के निशाने पर आए, ख़ास कर बिहार में आई बाढ़ के दौरान।
पर लालू जी तो बातों के बादशाह ठहरे कुछ भी कह दिया तो ख़बरों में आना ही है , मीडिया उनके पीछे भी लगी रहती है । पर इस बार उनका गुस्सा फ़ुट पड़ा इसकी वज़ह कई है , एक तो वो मीडिया द्वारा बनाई गई नीतिश कुमार की सुशासन बाबु की छवि , तो दूसरी तरफ़ राहुल गाँधी द्वारा नीतिश कुमार के अच्छा काम करने के बयान पर लालू जी को लगी चिढ। ऊपर से कांग्रेस का लालू जी पर तीखा वार । इन सब के साथ छपरा में राजीव प्रताप की चुनौती, ख़ुद के साथ पार्टी के हार का डर, प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिशों पर पानी फिरता हुआ देखना, साले साधू यादव की बगावत , इन सब के बीच मन का गुस्सा तो था ही पर बार-बार पत्रकार सवाल करे तो इसका गुस्सा पत्रकारों पर उत्तारने से बेहतर क्या हो सकता है।
खैर लालू जी के लिए इतना तो कहा ही जा सकता है कि सत्ता में रहते हुए अगर वे बजाए जातिगत समीकरण बनाने के, विकास का काम करते तो देश के सबसे बड़े समाजवादी नेता तो होते ही बिहार सबसे संपन राज्य होता । और अब जनता जिस तरह ठेंगे दिखा रही है सर आंखों पर बैठती।
लालू जी अब ख़ुद के गिरेबान में झांकिए और मीडिया पर गुस्सा निकालना बंद कीजिये।

Wednesday, February 25, 2009

मैं शर्मिंदा हूँ, कि मैं .......

टीवी चैनलों की भीड़ बढ़ रही है, पल-पल की ख़बर दुनिया के एक कोने से दुसरे कोने में बस मिनटों में मिल जाती है, जिन खबरों को जानने के लिए लोगो को सुबह की अख़बार का इंतजार रहता था, वही ख़बर चंद मिनटों में घर बैठे लोग जान जाते है, विजुअल्स के जरिये लोग वो तमाम चीजे देख पाते है जो घटनास्थल में हुई हो ,फिर भी पत्रकारिता की इस विधा और पत्रकारों पर लोगो का भरोसा कम होता जा रहा है .......टूटते भरोसे की कसक एक पत्रकार होने की वज़ह से महसूस करता हूँ , मात्र दो सालो के करियर में जो बद्लाव मैंने महसूस किया है वही अपने छोटे अनुभव के आधारपर लिख रहा हूँ........

दो साल पहले जर्नलिज्म की पढ़ाई ख़तम करने के बाद से ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़ गया , जब जुडा था तब और अब में वक्त के फासले भले ही कम हो लेकिन मीडिया में बहुत कुछ बदल चुका है, सबसे बड़ा और नकारात्मक बद्लाव आया है आम आदमी की मीडिया पर विश्वसनीयता को लेकर आई कमी में ।यही नही पत्रकारों की छवि में भी गिरावट आई है, पत्रकारों को अब नेताओ का दलाल, सिर्फ़ खाने पिने के लिए चापलूसी करने वाला इन्सान, अपनी तारीफ पाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाने वाले शख्स के तौर पर की जाने लगी है । पर इसके लिए दोषी भी ख़ुद पत्रकार ही है।
कोई प्रेस कांफ्रेंस करे और खाने पिने का अच्छा इंतजाम ना हो, तो पत्रकार नाराज़ हो जाते है, जम के खाना मिले तो चेहरे की खुशी देखिये प्रेस कांफ्रेनस कराने वाले जानते है की बड़े - बड़े टीवी चैनलों के पत्रकारों को कैसे खुश रखना है, और कैसे इन्हे आगे पीछे घुमाना है । ख़ुद को तोप समझने वाला पत्रकार तो आयोजक की इस लागलपेट को अपनी शान समझता है , पर आयोजक की नज़रो में पत्रकार की इज्जत दो टके की रह जाती है। एक वाकया बताता हूँ, एक बड़े शराब व्यवसायी समय समय पर प्रेस कांफ्रेंस बुलाते थे, पत्रकारों को पिलाने की जम कर व्यवस्था की जाती, शराब पीने के लिए स्वयम्भू वरिष्ठ पत्रकार एक दुसरे को धकेलकर आगे निकलने के लिए धमाचौकारी करते और व्यापारी महोदय बड़े - बड़े पत्रकारों की ऐसी हरकत देखकर मंद मंद मुस्काते, और अपना उल्लू सीधा करते। अब जरा सोचिये जहाँ कहीं भी ऐसी कांफ्रेंस बुलाई जाती है वहां कम से कम १० -२० लोग तो होते ही है जो ऐसे आयोजनों से जुड़े होते है , उनके समक्षपत्रकारों और उनके चैनलों की विश्वसनीयता ख़त्म हो जाती है, उनकी नजरो में पत्रकार की हैसियत सिर्फ खाने चबाने वाले चापलूस भर की रह जाती है ।
नेताओ के सामने पत्रकारों की हैसियत दलालों की बन गई है जो उनके सामने किसी की ट्रांसफर- पोस्टिंग की डिमांड करता हाथ जोड़े खड़ा रहता है, नेताओ के अगल बगल फटकने वालो दलालों की तरह । अलग विभागों के अधिकारी-कर्मचारी वैसे पत्रकारों को ढूंढ़ते हैं जो मंत्रियों का करीबी हो और किसी तरह उनका काम मंत्री-नेताओ से करा सके । ऐसे पत्रकारों की लिस्ट काफी लम्बी है जो किसी भी शर्त पर नेताओ के खासमखास बनने के लिए लालायित रहते है, ऐसे में जेबी पत्रकार भला दर्शकों-पाठको के समक्ष कैसे अपनी निष्पक्षता साबित कर सकते है, खबरें एकपक्षीय हो जाती हैं ।
जाहिल रिपोर्टरों-कैमरामैन की भी कमी नहीं है किस्से क्या पूछना है क्या नहीं इन्हें नहीं मालूम , समसामयिक जानकारी होती ही नहीं, बस कैमरा उठाया सामने वाले के मुख में माइक लगाया और दाग दिया कोई भी उल्ल्जुलुल सवाल, सामने वाला कुछ बोला तो खबर झुंझलाया तो भी खबर .

पत्रकार होने का शर्म....

बात इस वैलेंटाइन डे की है , पार्कों में खुद को हिंदुत्व और धर्म के ठेकेदार बताने वाले पहुंचे तो खबर बना लेने के लिए लालायित पत्रकार लगे उनका मार्गदर्शन करने, लड़के मिले तो इससे पहले की हिंदुत्व के ठेकेदार कुछ करे, फुटेज बनाने और तस्वीरे उतारने के लिए कैमरामेन ही लगे उठक बैठक कराने . पार्क में ही कुछ लड़कियां बैठी थी, हांथो में फॉर्म था, पत्रकार उनकी तरफ दौड़ पड़े , पीछे से कार्यकर्ता भी दौडे, कार्यकर्ताओ से उनकी बेईजयती करवाई गई, लड़कियां रोने लगी कैमरे के हर एंगल से तस्वीरे बनाई गई, और पत्रकारों के लिए बन गई एक सनसनीखेज़ खबर . लड़कियां रो रही थी तो कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो पास ही बैठकर लड़कियों को टीज़ कर रहे थे, जरा सोचिये उन लड़कियों की नजरो में मीडिया या चैनलों के लोगो की क्या छवि बनी होगी ।

खैर मीडिया में हूँ तो सब देख रहा हूँ पर फिलहाल लोकतंत्र के इस चौथे पाए के लिए इतना तो कहा ही जा सकता है....

बस एक ही उल्लू काफी है बरबादे गुलिस्तां करने को ,

हर साख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा......

Tuesday, January 20, 2009

ये लोकतंत्र है....

हमारी वोट से चुने गए कहलाने वाले प्रतिनिधि क्या वास्तव में जनता की बहुमत का प्रतिनिधित्व करते है...
शायद नही
  • चुनाव के दिन लगभग आधे लोग वोटिंग नही करते ( ये जनता की गलती है), वोट के अपेक्षा पढ़े लिखे लोग घर में बैठ कर फ़िल्म देखना या होलीडे मानना ज्यादा पसंद करते है, हालाँकि बाद में यही बुद्धिजीवी तबका हर मुद्दे पर अपनी बात बेबाकी से करता है( घर के सोफे पे बैठकर) ।
  • जाति-धर्म उम्मीदवारों को चुनने का अहम् पैमाना होता है। इसी भरोसे तरह -तरह के समीकरण बनते है कही कोई लालू माई (मुस्लिम - यादव) समीकरण बनता है तो कहीं शिबू जैसा नेता माँ ( मुस्लिम - आदिवासी) समीकरण बनने की जुगत में लगा रहता है।
  • कुछ लोग पैसे लेकर वोटिंग करते है, बिना करोडो खर्च किए कोई चुनाव लड़ने की सोच भी नही सकता ( अब इतने रुपये कोई जनसेवा के लिए तो खर्च नही ही करेगा, हाँ करोडो लगाओ अरबों कमाओ का धंधा जरूर होता है )
  • एक कहावत है: "जिस ओर युवा चलता है उस ओर ज़माना चलता " पर चुनाव के दिन कई युवा के कदम उधर ही बढ़ते है जिस ओर शराब और पैसे मिलते हैं ।
लोकतंत्र जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा किया जाने वाला शासन है, ऐसा अब्राहम लिंकन ने कहा था, हमारे यहाँ भी प्रायः हर नेता लोकतंत्र की इसी परिभाषा को मानने की बात करता है, पर इतना कर के जो नेता चुना जाता है उसके लिए अमल की परिभाषा दूसरी है -
लोकतंत्र हमारा ( नेता का) , नेता के लिए जनता के नाम पर किया जाने वाला शासन है।

Monday, January 12, 2009

गांधीवादी नही है "मुन्नाभाई"

संजय दत्त राजनीति में किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं, समाजवादी पार्टी उनके गांधीगिरी के अंदाज़ से प्रभावित होकर और समाज में उनके गांधीगिरी के योगदान को भुनाने के लिए नबाबों के शहर लखनऊ से चुनाव में उतारने जा रही है। पर कथित समाजवादी अमर सिंह ये भूल गए की गांधीवाद को आधुनिक गांधीवाद "गांधीगिरी" में तब्दील करने का श्रेय संजय को नही बल्कि फ़िल्म डायरेक्टर राजू हिरानी को जाता है, मुन्नाभाई जो कहते हैं वो स्क्रिप्टरायटर ने बाकायदा लिखा होगा, डायलोग लिखा गया होगा मुन्नाभाई तो बस एक्ट कर रहे थे। तो अमर सिंह जी बजाय राजू हिरानी, फ़िल्म के स्क्रिप्टरायटर या फिर डायलोग लिखने वालो को चुनाव में क्यों नही उत्तारते सिर्फ़ इसलिए ना की वे संजय की तरह फेमस नही हैं, पर गांधीगिरी को जीवंत करने वाले तो वही लोग हैं। वैसे मुन्नाभाई को तो कम से कम गांधीवादी नही कहा जा सकता क्योंकि किसी गांधीवादी को एके-४७ की जरुरत तो नही ही पड़ेगी, किसी डॉन के संगति में रहने का इरादा भी नही रहा होगा पर मुन्नाभाई ऐक्टर अच्छे है और गांधीगिरी की भूमिका को बखूबी जीवंत कर गए । पर इसका मतलब ये नही की वे गाँधी के आदर्शों में जीते हैं , समाज में उन्होंने ऐसा कोई योगदान भी नही दिया जिसे याद रखा जा सके पर भाई राजनीति के लाज़बाब नौटंकीबाज़ अमर सिंह ना जाने उनके किस योगदान को ध्यान में रख कर चुनाव में उत्तार रहे हैं यही नही सजायाफ्ता संजय के चुनाव लड़ने में कानूनी अड़चन आने पर उनकी बीवी मान्यता को नेता बनने की तैयारी में वे लगे हैं खैर संजय अच्छे कलाकार हैं , जनता में प्रसिद्धी भी अच्छी खासी है पर इसका मतलब ये नही की वे अच्छे नेता भी साबित हो । जनता में अभिनेता की प्रसिद्धी का फायदा पहले भी प्रायः सभी दलों ने उठाया है पर कुछ को छोड़ कर शेष नाकाबिल ही साबित हुए। गोविंदा को ही ले मुंबई ने कितनी त्रासदी झेली बम धमाके हुए, ट्रेनों में बिस्फोट हुए, बाढ़ आई लेकिन नेता गोविंदा पर अभिनेता गोविंदा हावी रहा । गोविंदा चर्चा में रहे भी तो कभी अपने फैन्स को थप्पड़ मरने को लेकर तो कभी फ़िल्म डायरेक्टर को पिट कर , यहाँ उनके दिमाग पर सांसद होने का गुरुर हावी रहा होगा । नाम और भी हैं धर्मेन्द्र, हेमा मालनी, दारा सिंह, नीतिश भारद्वाज , दीपिका(रामायण की सीता मैया) जैसे लोगो ने तो हद कर दी उनके एक्टिंग को असलियत समझने वाली जनता ने उन्हें चुना पर वजाय जनता की समस्या सुलझाने के वे जनता से दूर ही रहे।
पर अब जब बात संजय/मान्यता की हो रही है तो इन्हे भी इनकी लोकप्रियता को ध्यान में रख कर ही टिकट दिया जा रहा है, गांधीवाद या गांधीगिरी टिकट दिए जाने का कोई ताल्लुक नही । पर इतना तो साफ़ है संजय जीतते हैं तो दूसरो की तरह किसी जमीनी नेता का हक ही मरेंगे। और हाँ अमर सिंह जी गांधीगिरी के समाज में योगदान को ध्यान में रख कर टिकट देना हो तो फ़िल्म डायरेक्टर राजू हिरानी, स्क्रिप्टरायटर को टिकट दे दीजिये ।

Saturday, January 3, 2009

अपने ही शहर में डरा डरा माही...

तकरीबन पॉँच छः साल पहले की बात है,मेरे एक पड़ोसी की मानसिक स्थिति थोडी ख़राब हो गई थी, गलती से वे जम्मू पहुँच गए, सेना को उनकी गतिविधियाँ संदिग्ध लगी तो उन्हें पकड़ लिया गया । सेना ने पूछताछ शुरू की उनसे पुछा जाता कहाँ से आए हो जबाब में वे ख़ुद को रांची का बताते पर सेना के लोग रांची को करांची समझकर पिटते रहे, कुछ घंटे बाद ही एक बिहारी सैनिक ने अपने साथियों को रांची के बारे में बताया की रांची, झारखण्ड की राजधानी है, तब जा कर उन्हें छोड़ा गया । पर अब रांची को एक नई पहचान मिली है, रांची के नाम को महेंद्र सिंह धोनी ने पुरे विश्व में पहचान दिलाई । पर माही को अपने ही शहर में धमकियाँ मिल रही हैं, जान से मारने की धमकी, माँ-बाप को मारने की धमकी । ऐसे में माही रांची छोड़ सकते हैं , रांची छोड़ने की वज़ह और भी हो सकती है ।
फैन्स से परेशानी -
माही को रांची में सबसे ज्यादा परेशानी अपने फैन्स से है। माही जब भी शहर में होते हैं लोगो की भीड़ उनके घर के आसपास लगी रहती है , जहाँ जाते हैं भीड़ साथ साथ होती है। ऐसे में उनकी प्राइवेट लाइफ एक तरह से खत्म हो गई है वे ना तो अपने दोस्तों से मिलपाते हैं और ना ही आजाद हो कर शहर में घूम ही पाते हैं। ऊपर से खबरनाबिसों की फौज दिन रात उनके आगे पीछे लगी रहती है। घर में हो तो उनकी तस्वीर उतरने के लिए कैमरामैन उनके घर की चारदीवारी पर खड़े रहते हैं, मानो माही के अलावे और कहीं ख़बर ही नही।

Wednesday, December 17, 2008

जूते की महिमा अपरम्पार...

भई
मिसाइल, गोली बन्दूक जैसे हथियारों का निशाना भले ही चुक जाए पर जूते का निशाना
हमेशा सटीक बैठता है, चोट शरीर पर लगे ना लगे प्रतिष्टा पर आंच जरुर ही आता है।
जूते ने अपना कमाल दिखाया है, जूते की बदौलत ही एक टीवी पत्रकार दुनिया में हीरो बन गया। सोचता हूँ मेरे जैसे कितने ही टीवी पत्रकारों के जूते रोज रोज फोकटिया न्यूज़ के चक्कर में घिस रहे हैं, कम से कम मैं तो किसी को अपने आठ नम्बर के जूते की फटी सोल से इज्जत दूँ। मानता हूँ मुझे अंकल सैम ना मिले पर हमारे अगल बगल भी तो कितने मामू लोग बैठे हैं । बल्कि ये मामू तो और भी सुलभ हैं कदम कदम पर मिल जाते हैं । आज कल मामू लोग आतंकवाद के खिलाफ मुहीम चला रहे हैं, जनता की सुरक्षा की चिंता इन्हे खाए जा रही है, वैसे वे जनता का बहुत कुछ जनवादी और जनसेवक होने की वज़ह से खा चुके हैं। मामू भी सुरक्षित रहे इसके लिए उनकी सुरक्षा भी बढ़नी जरुरी है,प्लस -बी प्लस और सी प्लस से काम नही चलेगा कम से कम जेड प्लस और कुछ कमांडो तो जरुरी है खैर भाई ये सब तो उनका हक़ है। पर हमारा भी हो फ़र्ज़ बनता है ना की मामू की इस सेवा का कुछ तो अदा करे जैदी से थोडी सीख मिली सोच रहा हूँ मामू को भी जूते की महिमा से परिचित कराया जाए।

आप भी सोचिये नही ये सही वक्त है...चलिए मामू लोग का फ़र्ज़ निभा दिया जाए।

Tuesday, December 9, 2008

कुछ ख्वाब अधूरे से....

हम जिससे बारे में सोचते हैं , जिसे चाहते हैं उसकी याद हमेशा हमारे साथ होती है । कई बार सुबह-सुबह उसका ख्वाबों में आना हमें खूबसूरत एहसास से भर जाता है, लेकिन इन ख्वाबों का अधुरा रहना सालता भी है।
सुबह का वक्त है, चारो ओर हल्का अँधेरा रहा होगा। हलकी ठण्ड से शरीर कंपकपा रहा है, नींद में ही मैं अपनी रजाई से अपने मुँह को ढँक लेता हूँ।थोडी देर बाद एक ख्वाब की दस्तक होती है , एक ऐसा ख्वाब कि जो मेरी जिन्दगी का सबसे सुनहरा ख्वाब है।उसे सिर्फ़ ख्वाब ही क्यूँ कहूँ शायद जिन्दगी में उससे बड़ी चाहत मेरे लिए कुछ और नहीं। आधी नींद में हूँ पर दिल कह रहा है अभी मेरे साथ जिसके होने का एहसास है वो अब मेरे साथ है , हमेशा हमेशा के लिए मेरे साथ। दिल कि धड़कन उसके पास होने के एहसास भर से ही तेज़ हो रही है, ख्वाब के भीतर ही मैं कई और ख्वाब बुन रहा हूँ। पर ये क्या एकाएक कोई जोर जोर से मेरे नाम से पुकारने लगा...."भाई उठो उठो ... कितनी देर सोओगे अब उठ भी जाओ , सूरज निकल आया और ज़नाब अभी तक सो रहे हैं , ऑफिस नही जाना क्या" । दिलो-दिमाग में खूबसूरत एहसास लिए अनमने ढंग से मैं आँखें मलता उठ गया , ये सोचता हुआ कि थोडी देर बाद ही भाई उठाने आता तो क्या हो जाता , कम से कम मेरे ख्वाब तो अधूरे ना रहते। अब मेरी सबसे बड़ी चाहत एक बार फिर मुझसे उतनी ही दूर हो गई जितनी कि ख्वाबों में वो मेरे पास थी। रोज़ ही मैं उससे जुड़ी कोई ख्वाब जरुर देखता हूँ पर हमेशा ये ख्वाब अधूरे ही रह जाते हैं। क्यूंकि हर रोज़ ये ख्वाब तब ही टूट जाते हैं जब इन्हे पुरा होना होता है।

Wednesday, December 3, 2008

हम कैसे लोगो को चुनते है भाई......

अभी पुरे देश में जनता नेताओ को गालिया दे रही है। आतंकियों की ही तरह नफरत वैसे नेताओ के प्रति भी है जो संकट की इस घड़ी में भी अपनी वोट बैंक और सियासत में नफा नुकसान को लेकर राजनीति करते रहे। लेकिन हम सभी को एक सवाल अपनी अंतरात्मा से भी करनी चाहिए की इन नेताओ को नेता बनाता कौन, अपने जनप्रतिनिधियों को चुनने के लिए हम कौन सा मापदंड तय करते हैं?
नेता को 'ने' मतलब- नेतृत्व और 'ता' मतलब - ताकत जनता जनार्दन से ही मिलती है ऐसे में अगर हम ग़लत लोगो को चुनते हैं तो उन लोगो से कुछ बेहतर करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। चुनाव के दिन तथाकथित पढ़े लिखे लोग वोट करने नही जाते, उन्हें लम्बी कतारों में आमजनों के साथ खड़ा होना नही भाता। पर यही बुद्धिजीवी बाद में देश के हर मुद्दे पर बड़ी बड़ी बातें करते है। युवा देश की तस्वीर बदलने की ताकत रखता है, कहते भी हैं जिस ओर युवा चलता है उस ओर ज़माना चलता है, लेकिन युवाओं की फौज कभी पेट्रोल तो कभी दारू के चक्कर में धन्धेबाज़ नेताओ के आगे पीछे घुमती नज़र आती है। अलग-अलग दलों के चुनावी रैलियों में कई बार सामान समर्थक नारे लगते नज़र आते हैं, पैसे पर जनता की भीड़ जुटाई जाती है। अब जब जनता ही अपने अधिकारों के प्रति सजग नही होगी तो भला नेताओ से उम्मीद कैसे की जा सकती है ।
हम जिसे नेता चुनते हैं उसके चल चरित्र को समझना अत्यन्त ही जरुरी है । हम वोट करे तो उन्हें करे जो जाति,धर्म, क्षेत्र , भाषा के मुद्दे पर हमे उलझाय ना रख कर हिंदुस्तान को सुदृढ़ और विकसित करने का विजन रखे॥
पर इसके लिए हमे ख़ुद को बदलना होगा....
एक उम्मीद के साथ..आप का साथी...

Friday, November 28, 2008

हम चले इस फिजा से दूर कहीं दूर.........

मयलेश के शादी की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब बजाय विवाह गीतों के उसके घर में रोने की आवाज़ रह रह कर आती है, घर ही नही पुरा शहर गमगीन है। मलयेश मर चुका है। आतंकियों की गोली ने उसे छली कर दिया और घर का इकलौता चिराग बुझ गया। आईआईटी खड़कपुर से पढ़ाई करने के बाद मयलेश रिलायंस में काम कर रहे थे, ताज से मीटिंग कर के लौटने के क्रम में ही वे आतंकियों का निशाना बने। मौत के आगोश में जाने के पहले ही उन्होंने अपनी शादी में शामिल होने के लिए २७ तारीख को घर आने की सुचना दी थी , वो आए भी लेकिन जिन्दा नही मर कर। मलयेश की शादी उनकी प्रेमिका खुशबु से होनी थी लेकिन खुशबु और मलयेश का एक होना किस्मत को मंज़ूर ना था । आतंकियों ने बसने के पहले ही मलयेश- खुशबू की प्यारी दुनिया उजाड़ दी। ये कहानी तो मलयेश की है। उसकी मौत का गम रांचीवासियों को है लेकिन झारखण्ड सरकार की संवेदनहीनता देखिये मलयेश को अन्तिम विदाई देने या शोकाकुल परिवार को संतावना देने सरकार की ओर से कोई नही आया। हाँ औपचारिकता भर के लिए १ लाख के मुआबजे की घोषणा जरुर कर दी गई। वही मुख्यमंत्री शिबू सोरेन पत्रकारों को संबोधित करते हुए कह गए- " झारखण्ड में ताज या ओबराय जैसा होटल नही है इसलिए यहाँ आतंकी हमला नही होगा" । कहने का मतलब साफ है, मुंबई में हमले के लिए वे विकास को दोषी मानते हैं, शायद यही वज़ह है शिबू सोरेन जैसे झारखंडी नेता झारखण्ड का विकास नही करना चाहते।
लेकिन शिबू भूल गए की यहाँ आतंकी हमला करे न करे नक्सलियों ने खूब कहर बरपाया है , जितने लोग इस आतंकी हमले में नही मारे गए उससे १० गुना लोग नक्सली हमले में २ -३ सालो में मारे गए हैं। पर शिबू जैसे टुच्चे राजनीतिज्ञ इस बात को भला कैसे समझेंगे की विकास नही होने से ही नक्सली हमले हुए हैं और जहाँ तक बात आतंकी हमलो की है इसकी वज़ह सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत को कमज़ोर करना है। लेकिन नेताओ को बस राजनीतिस्वार्थ साधने से मतलब है ।
ईश्वर आतंकी हमलो में मारे गए सभी लोगो और जांबाज़ सैनिकों की आत्मा को शान्ति दे .....साथ ही नेताओं को थोडी सदबुद्धि दे ताकि वो दुःख की घड़ियों में ऐसी बहकी बहकी बातें ना करे ।

Saturday, November 22, 2008

.....आखिरी ख़त!!!

आपलोगों के लिए एक बार फ़िर चिट्ठी लाया हूँ। ये चिट्ठी लिखी गई है रामविलास द्वारा...
डीयर डिम्पू ,
डेढ़ बरस तक जो मुझसे प्यार किया , उसका शुक्रिया । आशा है पत्र मिलने तक तुमने नया प्रेमी पकड़ लिया होगा। उसके साथ अब डेटिंग पर भी जा रही होगी। हर प्रेमी को बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है। मैं भी स्ट्रगल कर रहा हूँ । प्यार के ढाई आखर कमबख्त बड़े मुश्किल से पकड़ में आते हैं। मैंने भी तुम्हे मिस करने के बाद मुहल्ले की ही शीनो पर लंगर डालना शुरू कर दिया है । प्रेम का यह मेरा चौथा प्रयास है। लेकिन इन प्रयासों ने मुझे एक सीख दी है। सोनी तुम तो जानती हो कि प्रेम शुरू करते ही कमबख्त लव लेटर लिखने पड़ते हैं। पता है न, मैंने तुम्हे कितने ख़त लिखे ? पहले के दो प्रेम पत्रों में भी लेटरबाज़ी करनी पड़ी। बड़ा झंझट है प्रेम मार्ग में। इसलिए तुम मेरे समस्त प्रेम पत्र लौटा देना। तुम्हे लिखे उन प्रेम पत्रों पर सफेदा पोत कर सोनी कि जगह शीनो लिख दूंगा । इससे मेरी मेहनत बच जायेगी। प्लीज, मेरे प्रेम पत्र लौटा देना, क्यूंकि उनकी फोटो कॉपी भी मेरे पास नही है । सोनी , तुम मेरी वह फोटो भी वापस कर देना । तुम तो जानती हो कि वही एकमात्र फोटो ऐसी है, जिसमे मैं ठीक-ठाक दिखता हूँ। वह मेरे पहले प्यार वाले दिनों कि फोटो है । बड़ी कीमती है । मेरे प्रेम पत्रों के साथ मेरी वह फोटो भी भेज देना, ताकि शीनो को भेज
हाँ , अपने प्यार कांड में डेढ़ बरस के दौरान मेरे द्वारा किए गए खर्च का हिसाब भेज रहा हूँ। आशा है, तुम शीघ्र ही इस खर्च का भुगतान कर भरपाई कर दोगी, ताकि तुम्हे भी नए प्यार के लिए मेरी ओर से एनओसी जारी हो सके और मैं भी नए प्यार पर खर्च करना शुरू कर दूँ। हिसाब इस प्रकार है: चाट पकौडी ८९५ रुपये, कोल्ड ड्रिंक्स २९३८ रुपये , स्नेक्स ५६४५ रुपये , जूस ३८४५ रुपये, फ़िल्म १२३५ रुपये , चैटिंग 1499 , मोबाइल फोन वार्ता २५४६ रुपये , पेट्रोल खर्च ४२५५ रुपये , गिफ्ट ७८५० रुपये, सकल योग ३०७०८ रुपये ( अक्षर में तीस हज़ार सात सौ आठ रुपये मात्र )। कृपया, ये रुपये मुझे शीघ्र भेजने की कृपा करना, ताकि मैं अपने शीनो के प्यार में इन रुपयों को कुर्बान कर सकूं। और हाँ यदि तुम्हारे पास मेरे द्वारा दिए गए गिफ्ट पड़े हो तो , उन्हें भी मैं आधी दाम पर खरीदने को तैयार हूँ। तुम उनका हिसाब बनाकर मेरी मूल रकम में से काटकर पुराने गिफ्टों में से भी भेज देना । इस पत्र के साथ तुम्हारे पुरे चार किलो तीन सौ ग्राम वजन के पत्रों का पुलिंदा भी संलग्न है, ताकि तुम्हे भी प्रेम पत्र लिखने में परेशानी न उठानी पड़े। तुम्हारी वह सुंदर फोटो भी मैं भेज रहा हूँ, जो तुम अपने नए प्रेमी झंडामल को दे सकती हो। तुम अपना हिसाब भी बता देना। वैसे तुम्हारा खर्च तो कुछ भी नही आया होगा। तुम हमेशा अपना पर्स भूल जाती थी । कमबख्त प्यार में लड़को की ही जेब ढीली होती है।
खैर, बीते प्रेम पर कैसा अफ़सोस , जब नया भी पधार चुका है ? आशा है, तुम मेरा हिसाब जल्दी से जल्दी साफ करके मुझे नए प्यार में कूदने में मदद दोगी।
तुम्हे सातवां प्रेम मुबारक हो।तुम्हारा छठा पूर्व प्रेमी मोती.....

Thursday, November 20, 2008

अज़ब गजब के रिश्ते .........

इन रिश्तो को क्या कहना । कब कहां और किससे बन जाए। कुछ दिन बीते हैं हाल -हाल तक 'ना उमर की सीमा हो ना जन्मो का हो बंधन' के राग अलाप कर बड़े बुजुर्गो और नौजवानों के बीच प्यार के रिश्तो पर बहस छिडी थी। खैर प्यार करने का हक सब को है चाहे वो बुजुर्ग हो या नौजवान । लेकिन कोई दादा या दादी बनने के उमर में नैन मटका करे तो ये थोड़ा अजीब लगता है। पर भई अब हमारी दुनिया में लोग रिश्तो की नई इबारत लिखने में लगे हैं।
बहुत पुरानी एक कहावत भी है रिश्ते रब बनाता है । जोडिया ऊपर वाला तय करता है । तब सवाल ये उठता है आज के आधुनिक परिवेश में ऊपर वाला भी कैसे -कैसे रिश्ते बनाने लगा है ? समलैंगिको की जमात क्या रब ही बनाता है। मर्द मर्द के पीछे भागने लगा है, औरत को औरत से ही प्यार होने लगा है। और तो और इस तरह के रिश्तो की वकालत भी लोग करने लगे हैं , ज़रा सोचिए क्या ऐसे रिश्ते सही है। ये ना सिर्फ़ प्रकृति के नियमो के खिलाफ है बल्कि मर्यादा के अनुकूल भी नही है। सिर्फ़ आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति का पिछलगू बनना हमारे लिए निहायत ही ग़लत है। अभी फ़िल्म दोस्ताना में दो लड़के सिर्फ़ इस लिए गे बनते हैं क्यूंकि उन्हें किराये पर घर चाहिए। फैशन जगत में भी कई समलैंगिक लोग हैं जो मात्र स्वार्थ के लिए ऐसे रिश्ते बनाते हैं । हाल ही में मेरठ की समलैंगिक प्रियंका- अंजू जिन्होंने अपने माँ बाप का कतल का आरोप है के पीछे भी करोडो की सम्पति का खेल है......
खैर अच्छा होगा इन रिश्तो को सही ना ठहराया जाए...
इन रिश्तो के पीछे की सच्चाई जो हो लेकिन कहीं ना कहीं स्वार्थ का भी एक खास स्थान होता है ।

Friday, November 14, 2008

वो लम्हे ......जो शायद लौट के ना आए.

हर दिन , हर पल की हमारी जिंदगी में खास अहमियत होती है। पर सबके जीवन में कोई पल ऐसा हो है, जिसकी सुनहरी यादों को हम समेट रखना चाहते है। मेरी जिन्दगी का वो लम्हा एक ठंडे हवा के झरोखे की तरह आया और तमाम जिन्दगी के लिए गर्माहट भर गया। ये वो वक्त था जब मैं मीडिया की पढ़ाई कर रहा था , नए जोश और ज़ज्बे से लबरेज़ कई साथी मिले । जल्द ही दोस्ती हुई, क्लास के बाद कॉलेज के बाहर पीपल के छाव तले हमारी पाठशाला लगती, ख़बरों में क्या दिखाया गया, दीपक चौरसिया , राजदीप सरदेसाई और ना जाने कई नाम शामिल होते जिनपर हमारी पाठशाला में चर्चा होती। राजनीतिक बहस होती । कभी- कभार क्लास की किसी लड़की से किसी से अफेयर की चुलबुली बाते भी होती। मैंभी बाहर की पाठशाला का अहम् विद्यार्थी हो चुका था। यहाँ कुछ दोस्त ऐसे बने जिन्होंने मेरे सोचने का नजरिया ही बदल दिया । खासकर अमितेश । संजीदा और शर्मीला , चरित्र का भी धनी, कम्युनिस्ट विचारधारा पर जिंदगी जीने वाला अमितेश आज दुनिया में नही है। हम दोस्तों में सबसे संजीदा इस दोस्त ने आत्महत्या कर ली। पत्रकारिता के मामले में भी अमितेश हम सभी साथियों से ज्यादा समझ रखता था। मेरी प्रेरणा का एक स्रोत वक्त से पहले ही ख़त्म हो गया।
खैर साथी तो और भी थे लेकिन काम के भवरजाल में हम ऐसे उलझे की अब उन साथियों से बात हुए भी साल बीत गए। कभी कोई कॉल कर दे तो लगता है, पीछे छुट चुका वो लम्हा प्रत्यक्ष आ खड़ा हुआ है। लेकिन ये मुमकिन नही क्यूंकि जिन्दगी के बीते लम्हे कभी लौट कर नही आते। ये बात और है की हम उसे अपने दिल की गहराई में समेट रख सकते है.....

Wednesday, November 12, 2008

सेना पर आक्षेप नही...

'मज़हब ये तो नही सिखाता' आलेख में मैंने जो लिखा इसपर सेना के धर्मांध होने की बात नही लिखी , बल्कि किसी सैनिक के मज़हबी उन्माद के रंग में रंगने पर चिंता जताई है। इसे सेना पर आक्षेप लगाने के तौर पर देखा जाना ग़लत होगा। बुद्धिजीवी पाठको से अनुरोध है, इसे अन्यथा ना ले.......

अलविदा लार्ड ऑफ द विन....

इस बार की चिट्ठी आई है ऑफ़ साइड के भगवान, सौरव चंडीदास गांगुली के नाम और लिखा है हिंदुस्तान ने।
विदाई की भावुक नमी में जीत का एक चम्मच शक्कर घुल जाये तो यही होता है। पनीली भावनायें मीठी हो जाती है और आसमां थोड़ा और झुककर पलकों पर बैठा लेने को बेताब। जी हाँ ये भारतीय क्रिकेट के महाराज की विदाई है कोई खेल नहीं। विदाई जीत के उस दादा की जो ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में पीटकर आता है। अंग्रेजों के भद्र स्टेडियम में अपने जज्बात दबाता नहीं बल्कि साथियो के चौकों और छक्कों और टीम की जीत पर टी शर्ट उतारकर हवा में लहराता है। जिसकी रहनुमाई में १४ खिलाडियो का समूह 'टीम इंडिया' हो जाती है। जो जीते गए मैचों की ऐसी झडी लगाता है की बस गिनते रह जाओ। जो 'टीम ''निकाला मिलने'' पर टूटता नहीं है। लड़ता है। समय का पहिया घूमता है और प्रिन्स ऑफ कोलकाता की टीम में वापसी होती है। भारतीय क्रिकेट का ये फाइटर शतक और दोहरे शतक के साथ सलामी देता है।
करीब डेढ़ दशक तक खेल प्रेमियों के दिलोदिमाग पर दादागिरी करने वाले बंगाल टाइगर ने भारतीय क्रिकेट की कमान उस वक़्त संभाली जब हर तरफ अँधेरा था। राह नहीं सूझ रही थी। ये लार्ड ऑफ द विन भारतीय क्रिकेट के सव्यसाची थे । जिन्होंने टीम ही नहीं खेलभावना को पराजय और अवसाद के अंधेरो से बहार निकाल कर बड़े बड़े मैदान में विजय पताका फहरायी। निराशयों के बीच आशा की नई किरण तलाशने की सीख सौरव ने ही टीम इंडिया को दी।
सौरव गांगुली का आना , उसका होना, और उसका जाना हमारे जेहन में हमेशा तरोताजा रहेगा। भारतीय क्रिकेट के परिवर्तन के सूत्रधार के रूप में सौरव सदा याद किये जाएँगे।
इस ग्रेट वारियर को खिलाडी के तौर पर अंतिम सैल्यूट..... ।
धन्यवाद....

Friday, November 7, 2008

मज़हब ये तो नहीं सिखाता ?


ये चिट्ठी हमारे आवाम के नाम है। हाल ही में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी मालेगांव बिस्फोट के मामले में की गई है , सेना के कर्नल पुरोहित भी इसी मामले में पकड़े गए हैं, अब ये वक्त कुछ सोचने का है। हमसब को धर्म के नाम पर होने वाले इन तमाम बखेडो को समझना होगा...

कुछ दिनों पहले की बात है, देश के किसी भी शहर में धमाके होने पर किसी कट्टर मुस्लिम संगठन का नाम आता था , तब मुस्लिमों को तो मानो पुरे विश्व में ही आतंकवादी माना जाने लगा । पर अब लगता है मंज़र बदल चुका है। अब इस बात से किसी को इत्तेफाक नही रखना चाहिए की आतंकवाद का कोई मज़हब नही होता। क्या हिंदू क्या मुस्लिम मज़हब के नाम पर फायदे बटोरने के लिए तमाम कवायद की जाती है, यह साबित हो चुका है। विश्व हिंदू परिषद् , बजरंग दल जैसे संगठन तो पहले से ही धार्मिक कट्टरता को हवा देते रहे है, पर अब वे आतंकी वारदातों को अंजाम देने में मदद करे तो यह उनके आतिवादी रवैये का चरम है।
बहरहाल ऐसे में हमारी सेना में भी धार्मिक कट्टरता हावी होने लगे तो इससे ज्यादा दुखदायी कुछ नही हो सकता। अब तक तो सेना के सभी जवान साथ मिलकर देश के शत्रुओं के खिलाफ लड़ते रहे थे, अब तक किसी मुस्लिम सिपाही को तो देशद्रोह के आरोप में नही पकड़ा गया, किसी ने जंग के मैदान में पाकिस्तानी सेना का पक्ष नही लिया, पर हिंदू धर्मान्धता से सेना भी नही बची ।
अगर धर्म के नाम पर ऐसा होने लगा है तो भइया हम कहेंगे-------
मत बांटो हमें मज़हब के नाम पे...
मत काटो हमें मज़हब के नाम पे,
है यही मज़हब तो फिर !
इससे अच्छा छोड़ दे मज़हब , खुदा के नाम पे........
धन्यवाद .......

Wednesday, November 5, 2008

ख़ुद को बदलने का वक्त...........

हो गई है पीर, पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिये,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
कवि दुष्यंत के कहे इन कथनों को अब चरितार्थ करने की जरुरत है। हमारे देश में भी अब एक आन्दोलन ,एक बदलाव की जरुरत है। हम भारतीय भले ही अपनी गंगा -जमुनी संस्कृति और साझे विरासत पर गर्व करे लेकिन आज हमारे देश में साम्प्रदायिकता हावी है। साझे विरासत पर क्षेत्रवाद हावी है। ऐसे में हम युवाओ को अमेरिकी बराक ओबामा से और अमेरिकियों से सबक लेने की जरुरत है.जहाँ राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अपने पहले भाषण में ओबामा ने संबोधित किया -" वी आर नॉट रेड ऑर ब्लू स्टेट्स , वी ऑल आर यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका " । मतलब अमेरिका एक है। वही हमारे भारत में अभी क्षेत्रवाद भयानक रूप ले चुका है। बिहारी , बंगाली, मराठी, असामी सभी की जंग छिडी है। धर्म के नाम पर हम बंट चुके हैं। धर्म भी भयावह रूप ले चुका है, मुस्लिम और हिंदू आतंकवाद की बात की जा रही है।
ऐसे में युवाओं को ख़ुद समझना होगा क्षेत्रवाद, धर्म जैसे मुद्दों से किनारा कर भारत को एक बनाना होगा । कहते है ना -" गंगा की कसम ......यमुना की कसम , ये ताना बाना बदलेगा, तू ख़ुद तो बदल .....तू ख़ुद तो बदल तब ये ज़माना बदलेगा........
Related Posts with Thumbnails