Wednesday, August 27, 2008

प्राइम टाइम पर गुदगुदी

खबरिया चैनल ख़बरों के मामले में कितने सीरियस हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्राइम टाइम में भी चैनलों पर गुदगुदी , आजा हस ले और गजोधर के चुटकुले दिखाए जाते हैं । ऐसा नही है कि खबरों कि कमी है , जम्मू -कश्मीर के हालत पर या बिहार के बाढ़ कि विस्तृत खबरे नही दिखाई जा रही हैं । इन खबरों के लिए बहुत हुआ तो मात्र एक पैकेज दिखा दिया जाता है , जबकि गजोधर कि हँसी पर आधे घंटे का प्रोग्राम दिखाया जाता है। वैसे तो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है , पर सही मायने में ऐसा कहना गजोधर के चुटकुले जैसा ही है ।

Tuesday, August 26, 2008

नेता का " ता " गायब

नेता वही है जिसमे "ने " मतलब नेतृत्व और "ता " मतलब" ताकत" हो। ताकत जनता का । लेकिन झारखण्ड के नेताओ की" ता" गायब हो चुकी है । उनकी ताकत खत्म हो गई है ,पर वे अभी भी नेतृत्व करना चाहते हैं ।लगता है " ता "की खोज उनकी तभी खत्म होगी जब जनता अपने जूते का "ता " इन्हे देगी ।

Monday, August 25, 2008

आख़िर बेगाने हो गए कोडा

जिन्दगी का सफर ,
है ये कैसा
कोई समझा नहीं ,
कोई जाना नहीं ....................
झारखण्ड के निर्दलीय मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता के मज़े ले चुके मधु कोडा का यह पसंदीदा गाना है । और उनकी जिन्दगी का आइना भी । ज्यादा दिन नहीं बीते हैं , उनके साथ रहने वाले , हर मोड़ पर कोडा का साथ देने का वादा करने वाले उनके निर्दलीय साथी उनसे साथ छोड़ चुके हैं । भानु प्रताप शाही , चंद्रप्रकाश चौधरी , कमलेश सिंह ,हरिनारायण राय , जोबा मांझी सभी मौका पाकर शिबू सोरेन के साथ हों लिए ।वहीँ बंधू तिर्की और एनोस एक्का तो पहले ही शिबू परिक्रमा में लग गए थे ।
आज कोडा के साथ कोई नहीं । वज़ह सता में कोडा नहीं , फिर उनके साथिओं को उनके साथ रह कर क्या फायदा , वे तो वहीँ होते हैं जहाँ सत्ता होती है ।अब shyad कोडा gaaye -
दोस्त दोस्त ना रहा
जिन्दगी हमें तेरा aitbaar ना रहा ।

Friday, August 1, 2008

लालची शिबू , नादान मधु

झारखण्ड की जनता का भगवान ही मालिक है ।जिनके किस्मत का फैसला एक नादान मुख्यमंत्री लेते हैं , जिनके गुरूजी गुरुघंटाल शिबू सोरेन हैं। संसद में विश्वासमत के समर्थन में वोट देने के लिए उन्होंने कांग्रेस के सामने ख़ुद को कोयला मंत्री बनाने की मांग रखी लेकिन मांगे पुरी होता नही देख शिबू अब राज्य की सत्ता पर आसीन होने के सपने संजोने लगे हैं । उनकी चाहत जेऍम ऍम के विधायकों की बैठक में उभर कर आई , जब एक सुर में उनके सभी साथियों ने उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया । अब शिबू उनके ही आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बने मधु कोडा को हटाने किम साजिश कर रहे हैं ।
ऐसे में नादान कोडा कोडा कहते हैं की वो शिबू के लिए पद छोड़ने के लिए तैयार हैं ।लेकिन उनकी परेशानी उनके चेहेरे से दिख जाती है । अमूमन शांत रहने वाले कोडा अब बार बार झुंझला कर पत्रकारों पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं ।

Monday, July 7, 2008

आख़िर भड़ास पर छपी टी वी चैनल की ख़बर

बहुत खुशी हुई की किसी ने झारखण्ड और बिहार में पत्रकारों की बदहाल स्तिथि पर भड़ास में आवाज़ उठाई , खास कर झारखण्ड में खुल रहे एक उपग्रह चैनल जो की कोलकत्ता की एक बड़ी ग्रुप द्वारा खोला जा रहा है । चैनल की बदहाल स्तिथि पर मैंने बहुत पहले लिखा था पर अब मेरी बात को जुबान मिलने लगा है । हाल ही में इस चैनल के ऐ चार हेड और सीईओ आपस में भीड़ गए । लातम जूतम हुई । सीईओ साहब की तो यहाँ मनमानी चलती ही है । इसी मनमानी के शिकार न्यूज़ एडिटर भी हुए । उन्हें भी नौकरी से हाथ गवानी पड़ी । हलाकि न्यूज़ एडिटर और ऐ चार भी दूध के धुले नही हैं । सीईओ के साथ मिलकर उन्होंने भी कईयों को बाहर का रास्ता दिखा दिया । पत्रकारिता की शुरुआत कर रहे युवाओ को धमकी भरा ईमेल भेजा गया। एक को तो न्यूज़ एडिटर ने यह भी कहा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर आप रजत शर्मा नही बन जायेंगे काम करना है तो कीजिये नही तो यहाँ से जाइये । फिर कुछ दिन बाद ही उस युवा को मीटिंग में लज्जित कर निकाल दिया गया। ऐसा नही था की वह अयोग्य था , लेकिन उसकी गलती थी की उसने सीईओ की ग़लत नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई थी । ऐसे में जरा सोचिये उस युवा पर क्या बीती होगी ? पत्रकारिता के शुरुआत में ही मीडिया के दलालों ने उसकी मानसिकता पर क्या प्रभाव डाला होगा ?
खैर खुशी हुई की किसी ने नामी ब्लॉग "भड़ास " में इस चैनल में हो रही गतिविधिओं की जानकारी दी । इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Friday, April 11, 2008

हाल ३६५ दिन टी वी का

बहुत ही उम्मीदों के साथ झारखण्ड में एक सॅटॅलाइट चैनल की शुरुआत होने जा रही थी । इसके लिए यहाँ दिल्ली से कुछ प्रोड्यूसर भी आ गए थे । लेकिन ३६५ दिन नाम के इस टी वी चैनल का मामला फिलहाल लटक गया लगता है । यहाँ काम कर रहे लोगों में लगभग २० से भी ज्यादा कर्मचारी पिछले ४ महीनों में सीईओ अमल जैन की ग़लत नीतिओं से नाराज होकर काम छोड चुके हैं । सुना है सीईओ ने अपने बेटे के मास्टर को अस्सिस्टेंट प्रोड्यूसर बना दिया है जिसे कंप्यूटर भी ओन् करना नही आता।

Thursday, April 10, 2008

मीडिया में कॅरिअर बनने की बात मत सोचना

समाचार पत्रों के रोजगार विषयक पन्नों में अकसर देखता हूँ , मीडिया में रोजगार के सुनहरे अवसर होने की बात लिखी जाती है । लेकिन मीडिया के फिल्ड में कितना रोजगार है , ये बात मीडिया में काम करने वाले लोग बखूबी जानते हैं । पहले मीडिया का छात्र और फ़िर एक पत्रकार होने के नाते में ये बात अच्छी तरह समझ सकता हूँ । आज मुझ जैसे नए लोगो को भटकना पड़ता है , काम मिलता भी है तो मुश्किल से । हर जगह पैरवी , पहुँच वालो की नौकरी पक्की हो जाती है योग्यता की बात करना ही वहाँ फिजूल है ।यही नही अब तो पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले कई संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह खुल गए हैं , जो सालाना लाखों की कमाई करते हैं , लेकिन उनके लिए कॅरिअर के भूखे युवाओं की चिंता जरा भी मायने नही रखती । कई सपने सहेज कर मीडिया में काम करने की उम्मीद लिए इन युवाओं को झटका तब लगता है जब बायोडाटा लेकर वे मीडिया हाउस के चक्कर लगाते हैं । अब वो दिन दूर नही दिखता जब लोग इन ठगों को दौड़ा- दौड़ा कर पीटेंगे

Friday, April 4, 2008

सब तोड़ने वाले हैं

कितनी अजीब बात है १९४७ में भारत के दो टुकड़े होने के बाद भी हमने अपने इतिहास से कुछ सबक नही ली है । कभी हिंदू मुस्लिम के नाम पर तो कभी मराठा और बिहारी ,असामी -हिन्दी भाषी के नाम पर हम आमने सामने हो जाते हैं । मरने मारने पर उत्तारु हो जाते हैं । क्या कभी कोई हिन्दुस्तानी होने के बारे में सोचता है? हम साथ मिलजुल कर भारत के विकास की बात क्यों नही सोचते ? आज यह सवाल हमारे जेहन में जरुर आनी चाहिये।

Thursday, March 20, 2008

नए नवेले मीडिया पर्सन की मुसीबत

सोचा था मीडिया में आकर समाज , देश की सेवा करूँगा । समाज के नीचले तबके की बात मीडिया के माध्यम से उपर उठाऊंगा ,लेकिन ऐसा सोचना त्तब जायज़ था जब मैं जर्नलिज़म की पढ़ाई कर रहा था । उस समय हमारे सामने गाँधी , शिवपूजन सहाय , राजा राम मोहन राय जैसे पत्रकारों का प्रेरनादायी उद्धरण मौजूद था ।लेकिन आज की बजारू पत्रकारिता में ऐसा सम्भव नहीं लगता । आज मीडिया समाजसेवा का ढोंग जरुर करती है पर ख़बरों के लिहाज़ से वही दिखाया जाता है जो बिकाऊ हो । यही नही नकारात्मक ख़बर बनाने के लिए ही ज्यादा जोर दिया जाता है । ऐसे में मुझ जैसा नया नवेला पत्रकार ख़ुद में असहाय महसूस करता है और ख़ुद को माहौल में ढालने की कोशिश करता है । और जब वह अपनी कोशिश में कामयाब होता है , तब उसके भीतर का ज़ज्बा दमतोड़ चुका होता है ।

Thursday, February 21, 2008

मीडिया की मंडी

एक मीडिया पर्सन दूसरो पर हो रहे जुल्मों सितम की आवाज़ जोर शोर से उठाता है । पर मीडिया हाउस में ख़ुद पर हो रहे अत्याचार को वह चुपचाप सह लेता है । लेकिन इस चुप्पी के पीछे उसकी मज़बूरी यह नही होती की वह कमजोर इन्सान है , अब पत्रकार नौकरी करते हैं । और जो लोग नौकरी करते हैं उनकी अपनी व्यावसायिक समस्याएँ होती हैं । यही समस्या पत्रकारों के भी साथ होती है । पत्रकारिता एक पेशा है जहाँ समाज में हो रहा जुल्मोसितम बिकाऊ मसाला है । इसी लिए मीडिया हॉउस के मालिक ऐसे मामलों को तो उठाते हैं ,लेकिन पत्रकारों के साथ उनका सलूक ख़ुद ही जयादती भरा होता है ।

Wednesday, February 6, 2008

इस जगत में ऐसा ही होता है

हम बात कर रहे हैं राजनीती की ,यहाँ पल पल अपने वादों से पलटना, नित्य नए नए गठबंधन बनाना आम बात है । पर हमेशा यही होता है हर नए गठबंधन को हमारे नेता जनता के हितों के लिए की गई आपसी सहमति बताते हैं । पर अब तक हुए ऐसे समझौते या सहमति से जनता का कितना हित हुआ है यह जवाब किसी के पास भी नही । वज़ह यह है कि ये सारे गठबंधन स्वार्थ के बुनियाद पर बने हैं । नेताओं का हित जब तक पूरा हुआ गठबंधन भी बना रहा । अब ऐसा ही स्वार्थपरक गठबंधन बनाने के लिए झारखण्ड के पूर्व मुख्यमन्त्री बाबूलाल मरांडी लालायित दिख रहें हैं । ६ फरवरी को उनके द्वारा आयोजित परिवर्तन रैली का उद्देश्य भी अपने इसी नए गठबंधन को जनता के सामने लाना है । कभी सफ़ेद धोती के नीचे आर एस एस की खाकी हाफ पैंट पहनने वाले बाबूलाल आज धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद का मुखौटा लगाकर समाजवादी कहे जाने वाले नेता मुलायम सिंह ,अमर सिंह के साथ राजनीतिक मंच पर आने के लिए आतुर हैं । अब देखना है उनका यह नया गठबंधन झारखण्ड और यहाँ की जनता के लिए कितना हितकारी होता है?

Monday, February 4, 2008

हाय रे राजनीती

राजनीती अब सिर्फ राज करने की नीति बन गई है । यह बात अब स्पस्ट हो गई है । केवल सत्ता पाने के लिए राजनेता बयानबाजी ही नहीं करते बल्कि देश में अलगाववाद लाने से भी परहेज़ नहीं करते । अभी अभी mumbai मैं नॉर्थ इंडियन के विरुद्ध जो गतिबिधियाँ हो रही हैं उसका गुनाहगार सिर्फ और सिर्फ राजनीती है ।
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